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Saturday, January 5, 2019

Mouthpiece #68

Grateful to be back...
I have been very irregular with my newsletter in 2018 and regularity is one thing that I had seriously committed to (to myself) when I began writing my mouthpiece every fortnight. I think I had become a part of a nice rhythm when the mind would start working on the idea for the upcoming mouthpiece and a week prior to posting it, I would start composing my thoughts into something coherent. After many months of having left it, I was going through some of the pieces last week and I could actually go back to the state in which those were written. I could still feel the pleasure I derived while writing some. Though a long time has passed since I last posted anything on this platform, I would like to resume this routine once again while reverently bowing down to the uncertainties in life.

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Friday, October 20, 2017

Mouthpiece #61

मन के मोती...
एक पथिक मैं किसी राह की,
एक मुसाफ़िर अपनी ही धुन की |

कूद-फाँद के कभी संभल के,
फ़ूँक-फ़ूँक के या मस्ती में,
रुके नहीं पग थमे नहीं पग,
था भी कहाँ कोई और विकल्प ?
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For that Glimpse from the Past
(This I wrote for another platform, posting it here…)
Bags were packed, weighed, not once but multiple times. Not more than 24 hours were left for one more journey to begin. In fact, one of the smaller journeys within a bigger journey of life. Where did the last few days fly away, she didn’t realise. Now with a cup of tea in her hand, she could actually feel the frantic pace at which she had been working for the past week or so. Her mind ran through all the lists that she had made as she prepared for her impending journey to meet her children in USA - gifts for each one of her children and grandchildren, her signature delicacies for every family - various sweetmeats (especially besan laddoo), a medley of pickles and what not. Not to forget innumerable things that needed to be taken care of before closing the house for 3-4 months.
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Saturday, August 19, 2017

Mouthpiece #56

Paradoxical or what?
न बाँधो इस अनवरत उन्मुक्त उड़ान को
समय की बेड़ी से इसे सरोकार ही क्यों हो ?
आंतरिक संयम को बाहरी चर्या क्यों,
मन के भावों को शब्दों का बाना क्यों ?

शायद कभी क्षितिज को न छू पाऊँ,
शायद कभी सबसे ऊँचा न उड़ पाऊँ,
शायद क्षमता की सीमा में बंध जाऊं,
पर मन की स्वछंदता को क्यों न पाऊँ |

लौट कर आऊँगी अपने घरोंदे पर फिर भी,
विस्तृत आसमान अधिक अपना सा लगे तो भी |
मन की एक तार काया के बंधनों से है जुडी,
चाहे बाकी सब अपने आशियाँ में हैं सिमटी |

This verse that I wrote a couple of years back, often comes to my mind whenever I introspect or rather open my eyes inwards. I do see myself as a free spirit that soars beyond all borders and boundaries, that cruises in a trans like peaceful state and to whom all restraints, whatsoever, are unknown.

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On Raksha-Bandhan
Came across this beautifully written poem by Prasoon Joshi, so sharing it here:
बेहेन अक्सर तुमसे बड़ी होती है,
उम्र में चाहे छोटी हो,
पर एक बड़ा सा एहसास लेकर खड़ी होती है,
बेहेन अक्सर तुमसे बड़ी होती है,
उसे मालूम होता है तुम देर रात लौटोगे,
तभी चुपकेसे से दरवाज़ा खुला छोड़ देती है,
उसे पता होता है की तुम झूट बोल रहे हो,
और बस मुस्कुरा कर उसे ढक देती है,
वो तुमसे लड़ती है पर लड़ती नहीं,
वो अक्सर हार कर जीतती रही तुमसे,
जिससे कभी चोट नहीं लगती ऐसी एक छड़ी है,
पर राखी के दिन जब एक पतला सा धागा बांधती है कलाई पे ,
मैं कोशिश करता हूँ बड़ा होने की,
धागों के इसरार पर ही सही ,
कुछ पल के लिए मैं बड़ा होता हूँ,
एक मीठा सा रिश्ता निभाने के लिए खड़ा होता हूँ,
नहीं तो अक्सर बेहेन ही तुमसे बड़ी होती है,
उम्र में चाहे छोटी हो, पर एक बड़ा सा एहसास लेकर खड़ी होती है |

Mouthpiece #55

बहुत याद करती हूँ

माँ तुम्हें मैं बहुत याद करती हूँ,
असीमित प्यार के भण्डार को याद करती हूँ |

तुम्हारे हाथों की गर्माहट को याद करती हूँ,
तुम्हारी आँखों के भावों को याद करती हूँ,
तुम्हारी प्यारी मुस्कुराहट को याद करती हूँ,
मुझे ‘बेटी’ कह कर पुकारने को याद करती हूँ,
मेरे अनकहे बोलों को समझने को याद करती हूँ |

मेरी गलतियों को भूल जाने को याद करती हूँ,
मेरी हर बात को मान देने को याद करती हूँ,
मुझे जानने के एहसास को याद करती हूँ,
मेरे साथ होने के संतोष को याद करती हूँ,
तुम सब जानती हो, उस भरोसे को याद करती हूँ |

तुम्हारे साये में बैठने को याद करती हूँ,
तुम्हारे किस्से कहानियों को याद करती हूँ,
तुम्हारे सुझावों सलाहों को याद करती हूँ,
बात-बात में बात कह देने को याद करती हूँ,
तुम्हारी सरल जीवनशैली को याद करती हूँ |

सालों ही बीत गए तुम्हें देखे हुए,
तुम्हारे होने की अनुभूति को याद करती हूँ |
माँ मैं तुम्हें बहुत याद करती हूँ |

Reading time...
Read ‘Same Soul, Many Bodies’ by Dr. Brian Weiss. His books dispel almost all doubts about soul being immortal and take up different bodies at the right time. His cases highlight the fact that what we are experiencing has explanation in our previous births. In this particular book, he is even able to make use of his progression theory on some of his patients to heal their present. An interesting read. Have ordered another book by the same author.

What's cooking? Rava idli
‘जैसा देस वैसा भेस’ - When in Rome, do as Romans do. I would rather modify it to ’जैसा देस वैसा खाना’ - When in Rome, eat what Romans eat. I don’t know about Rome but happily adopted this when we were in Bangalore. It is in fact a great way to make use of the local produce as well. Coming to Rava idli now. Idli’s various avtaars were absolutely unknown to me before Bangalore became our home for almost seven years. I especially liked a good number of options for healthy, light and not very expensive breakfast options that are available at almost every other corner throughout the city. I think this is true about most of the South Indian cities as well. There in one of the Darshini hotels we ordered Rava idli for the first time and there was no looking back post that. It immediately got an entry in my 'to try dishes’ that day itself. I checked with some of my friends for the exact proportions and ingredients. After many iterations over the years, I have come up with the following recipe which gives consistent results every single time. This usually works as a handy option when nothing else comes to mind. Moreover, it can be prepared quickly as one is spared of soaking and grinding part of the regular rice idlis.

recipe here...

Mouthpiece #54

काश...
काश…
आज फिर वही छोटी सी बच्ची बन जाऊँ,

जिसे प्यार से बुलाने के अनेकों ही नाम थे,
स्कूल में लिखवाए नाम को कम ही जानते थे |

जिसे झालर वाली फ्रॉक पहनने का शौक था,
फ्रॉक पर बने फ़ूलों से भी ज़्यादा खिला चेहरा था |

जिसे खूब ज़िद करना आता था और मनवाना भी,
जिसकी आँखों में ही बसते थे अनगिनत सपने भी |

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What's cooking in the kitchen? Classic Aloo-parantha
Nothing beats a good aloo parantha as a breakfast delicacy in Punjabi homes and the good part is, it can be prepared all through the year, as the main ingredients - potatoes and onions are always available.

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Saturday, May 7, 2016

श्रद्धा सुमन

कभी अकेला पा घेर लेता है यादों का मेला मुझे
सोचती हूँ कैसा होता आज अगर होता तुम्हारा साथ साथ में
देती हूँ मन को दिलासा यह कह फिर, जितना मिला, मिला तो
एक उदाहरण है उस ऊँचाई का और उस-से जनित एक उद्देश्य भी

ढूँढती हूँ वो सुकून वो अपनापन कुछ छोटी बड़ी चीज़ों में
कुछ साथ बिताए लम्हों में और छोटी छोटी बातों में
शायद हो पाये उस स्पर्श की थोड़ी अनुभूति फिर से
शायद पा सकूँ तुम्हारे आशीर्वादों की लड़ी फ़िर से एक बार

बेसन के वो लड्डू जो तुमसे बेहतर कोई बना न सका
सबसे छुपा कर चार और डाल देती थीं तुम उस डिब्बे में
तुम्हारे प्यार और आशीर्वाद की अभिव्यक्ति ही तो थी
पहुँच जाती थी जो मुझ तक बिना कुछ कहे सुने भी

एक अनुपम सुख का अनुभव करतीं थीं तुम शायद
तभी तो अपने हिस्से की खीर भी हमें खिला देतीं थीं
बादाम की वो कुछ गिरियाँ जो तुम प्यार से देतीं थीं
वो चंद गिरियाँ ही बहुत थीं तृप्त कर देने को हम सब को

अनेकों बेड़ियों से बद्ध रहा तुम्हारा सम्पूर्ण जीवन
पर अपनी सादगी सरलता से कर दिया नतमस्तक उन्हें भी
अपने कर्म और धर्म के प्रति सदा तत्पर और सजग रहीं तुम
रिश्तों को इतना सींचा कि हो गए परिभाषित वे भी फ़िर

नहीं हैं मोहताज मन के भाव और उदगार शब्दों के
कैसे सिमट सकता है कुछ असीम, शब्दों की सीमाओं में
मन से कुछ श्रद्धा सुमन समर्पित कर रही हूँ तुम्हें
शायद पहुँच जाएँ तुम तक, हो हवा के किसी झोंके पे सवार

Tuesday, April 12, 2016

कविता : गति

एक और मील का पत्थर राह बदलने का संकेत या आशंका
कौन सी राह से जुड़ना है निश्चित जो बनेगी तक़दीर
कुछ राहें, कुछ मोड़, तय हो जाता जीवन का पूरा सफर
बदल जाता मकसद, बदल जाता नज़ारा और नजरिया

कुछ अपने, बहुत अपने कि जिनसे अपना कोई हो न सके
छोड़ देते साथ, हमेशा के लिए, करके सबको अलविदा
उस समय से दूरी बढ़ती रही जब साथ था उनका साथ
लम्हें तब्दील हुए दिनों में और दिन सालों में

वक़्त घाव भर देता है, कहते हैं सब, सुनते हैं हम
पर कटा हिस्सा कभी वापिस नहीं आता, यह जानते हैं हम
कमी उसकी खलती है कभी ज़्यादा कभी कम, पर हर दम
कैसा होता आज अगर होते वो भी साथ, सोचते हैं हम

समय कभी थमता नहीं, काम कोई भी रुकता नहीं
निरन्तर गति ही जीवन का है पर्याय, और उसकी नियती भी
पर एक टीस मन में चुभती है जब याद आते हैं वो पल
जब हम भी कभी अमीर थे, उन रिश्तों के साथ से

Tuesday, December 1, 2015

कविता : एक बूँद

भावनाएँ अनेक पर उभर कर आती एक अभिव्यक्ति
अनेकों नाम से जानते हैं सब पर स्वभाव उसका एक
कभी आसमान से गिरती पानी की चंचल बूँद बन कर
कभी आँखों से ढुलक जाती थोड़ी नमी की धार बन कर

कितना कुछ समा सकता है एक छोटे से कतरे में कि
पूरा इन्द्रधनुष सिमट आता है पारदर्शी शीशे में
नज़र को धुंधला कर देती आँखों में समा कर
मेहनत का प्रमाण बन जाती ललाट पर उभर कर

कभी किसी की पिपासा तृप्त करने में तत्पर
कभी मन के भावों को व्यक्त करने का साधन
कभी गुलाब की पंखुड़ियों पर सुंदरता का उदाहरण
कभी नए जीवन का संचार करने की ज़रुरत
रूप, नाम, काम बेशक हैं अनेक पर अस्तित्व है एक I

Sunday, October 11, 2015

कविता : उड़ान

न बाँधो इस अनवरत उन्मुक्त उड़ान को

समय की बेड़ी से इसे सरोकार ही क्यों हो ?
आंतरिक संयम को बाहरी चर्या क्यों,
मन के भावों को शब्दों का बाना क्यों ?

शायद कभी क्षितिज को न छू पाऊँ,
शायद कभी सबसे ऊँचा न उड़ पाऊँ,
शायद क्षमता की सीमा में बंध जाऊं,
पर मन की स्वछंदता को क्यों न पाऊँ |

लौट कर आऊँगी अपने घरोंदे पर फिर भी,
विस्तृत आसमान अधिक अपना सा लगे तो भी |
मन की एक तार काया के बंधनों से है जुडी,
चाहे बाकी सब अपने आशियाँ में हैं सिमटी |

Sunday, September 6, 2015

कविता : फ़िर मिलेंगे

मैं आँखें खुली रखूँ या फ़िर मूँद लूँ
क्या करूँ कि वह चेहरा धुँधला सा न लगे
चेहरे की एक एक लकीर फ़िर स्पष्ट हो जाए
हाथ में हाथ रखने का एहसास वापिस आ जाए
बस इसी उधेड़बुन में निकल गई एक शाम,
जो मन से समर्पित थी सिर्फ तुम्हीं को ही |

आज फ़िर मन में तुमसे मिलने की तड़प उठी है
आज फ़िर उस आत्मीयता को तलाशता है यह मन
यादों के संदूक से एक एक कतरा पकड़ रही हूँ
तरतीब से लगा कर फ़िर संजो रही हूँ
वो जो 'है' था कितना कुछ 'था' है बन गया
फ़िर न आने के लिए सदा के लिए है चला गया

यक़ीन है फ़िर मिलेंगे हम - कभी तो, कहीं तो
बहुत दूर न निकल जाना कि ढूँढ न पाऊँ तुम्हें तब
बाकी हैं कुछ काम जो नियत हैं मुझे अभी
पर मन के एक कोने में वास है तुम्हारा ही
बारिश कि बूंदों सा भिगोता है जो अंतर मन को |

जो सरलता तुमने अपनाई सदा अपने जीवन में
जो सादगी तुमने सार्थक की अपने अंदाज़ में
जो राह तुमने दिखाई एक मुसाफ़िर बन कर
जो जीवन दर्शन तुमने कराया सिर्फ उस पर चल कर
जो भरोसा तुमने दिलाया विश्वास और निष्ठा में
कोशिश है उस सब को अपना सकूँ हर एक पल में |

Thursday, August 20, 2015

कविता : बस वही

बूँदें तो कम नहीं बिखरी हर तरफ मेरे
पर आस है उस एक बूँद की जो भिगो दे अंतर मन को
चातक भी तो बैठा है स्वाति नक्षत्र की राह में
क्यों नहीं संतुष्ट होता वह किसी भी बूँद से

हरियाली की चादर तो ओढ़ी है कई बार इस धरा ने
पर उस ठूँठ को तो इंतज़ार है बस उसी कोम्पल का
जो करे जीवन को अंकित उस टहनियों के पिंजर में
ताकि हो जाए एहसास उस ठूँठ को भी तरु होने का

रिश्ते नाते तो बहुत बनाते निभाते हैं हम यहां
पर हो जाते हैं कुछ सम्बन्ध सदा के लिए अजर अमर
कि बस एक अपने से सम्बोधन को ढूँढता है फिर यह मन
वही भाव, वही भावना, वही स्नेह कहीं और कहाँ

Wednesday, July 15, 2015

सीख लिया है मैंने भी अब खाना बनाना

सीख लिया है मैंने भी अब खाना बनाना
पहचानने लगी हूँ हर मसाले की खुशबू को मैं भी
सब्ज़ी का ताजापन भी अपना एहसास कराने लगा है I
कुछ ऐसी चीज़ें जो पहले महत्त्वहीन सी लगतीं,
अब पता चल गया है उनका स्वभाव मुझे भी I
लुप्त रह कर किसी की जान कैसे बना जाता है
बोध कराया हैं इन्हीं छोटी छोटी चीज़ों ने मुझे I

धनिया पुदीना जो पहले एक से जान पड़ते थे
आज पता है कितने स्वाद के भण्डार समेटे हैं ये I
खाना बनाना और फिर उसे अपनों के लिए परोसना
सच में एक अनुपम सुख देता है यह एहसास
इस भावना को जीना भी तो तुमसे ही सीखा है
जाने अनजाने आ जाती हो मेरी आँखों के सम्मुख
सम्बोधित करके मुझे दिखा जाती हो राह सही सी

सीख लिया है मैंने भी अब खाना बनाना
पर मन में कसक सी होती है उस महक की
जो आती थी तुम्हारी बनाई रसोई से सदा
वही सब चीज़ें तो हैं अब भी, यहां भी
मसाले भी दो ज़्यादा ही होंगे,  कम नहीं
पर क्यों एक कमी सी रह जाती है सब में फिर भी
क्यों नहीं मिलता वह स्वाद वही रस

शायद हाथों का ही जादू होगा उस स्वाद में कहीं
प्यार का ही रूप होगा उस महक में रचा-बसा
स्नेह से बना कर बिठा कर खिलाती थीं तुम
तब समझ नहीं पायी कैसा संतोष पाती थीं तुम
आज भी वह चेहरा आँखों में समाया रहता है
काश एक बूँद और मिल जाए उस ममता के सागर से
काश उस महक में बिता सकूँ दो पल फिर से कभी I

Saturday, May 9, 2015

मेरी वसीयत तुम्हारे नाम -


उन गेंदे के फ़ूलों में मिल जायेगी झलक मेरी
सूखे फ़ूलों को मंदिर से उठा कर डाला था जहां
तब तो मुरझा कर धरती में समां गए थे वे फ़ूल
यकीं है नयी ज़िन्दगी का संचार करते होंगे अब वहाँ

हाथों से रोम्पी थी कुछ आँगन की मिट्टी
अभी भी मेरी उँगलियों के निशाँ पाओगे वहाँ कहीं
नयी तुलसी फ़ूट पड़ी होगी उसी कोने में फ़िर
मौसम के साथ बूढी हो दे जायेगी बीज अपना

चमेली के झाड़ पर लगी होंगी कलियाँ फ़िर से
अपनी हलकी खुशबू से महकाती होंगी घर भर को
तुलसी के पत्तों के साथ जोड़ कर माला बुन देना कभी
हो जाएगा श्रृंगार छोटे बाल गोपाल का मेरे उस से

सहेज कर कुछ यादें रखी थीं उस अलमारी में
कुछ पैगाम जो मेरे नाम मिल जाएँगे वहीँ कहीं
गीली न करना आँखें अपनी, उन यादों में खो कर
सुकून दिया था उन लिखी पंक्तियों ने मुझे बहुत कभी

रखा था एक संदूक भी उसी अलमारी में ऊपर
छोटी बड़ी चीज़ें रखती थी तुम्हारे लिए जिसमें
जैसा भी है दे देना उसे जगह अपने पास में ही
कभी खाली न पाओगे उस संदूक को तुम अब भी कभी

लिखा था कुछ थोड़ा बहुत मनन करने के लिए अपने
वास्तव में जीवन दर्शन छुपा है उनमें ही कहीं
ले जा सकते हो तो ले जाओ, साथ मेरे आशीर्वाद के
जब भी पढोगे, पाओगे मेरा प्रतिबिम्ब उन सब में भी

वह कोना जहाँ बीत गए ज़िन्दगी के कई सावन
हो सके तो सूना न होने देना उस कोने को तुम कभी
मेरी भक्ति की शक्ति है उस जगह पर समायी
जो तुम्हारे लिए बरसेगी सदा आशीष बन कर

मेरे जीवन का मकसद था तुम से, पूरा हुआ है जो अब
आशा है लगे हो तुम अपने जीवन के मकसद की राह पर
जी जान लगा देना जो निर्धारित है तुम्हें कर्म
और समर्पित कर देना उस ईश्वर के चरणों में सब

माँ थी तुम्हारी, माँ रहूँगी सदा
वह जगह कभी रिक्त न होगी रहा यह वादा
मेरा अंश है तुम में कैसे बदल सकता है यह
जब भी मन से पुकारोगे पाओगे अपने पास तुम

Godrej Expert
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